कोसदरा गांव में राधेश्याम नायक की बैंगन की खेती आज पूरे इलाके में चर्चा का विषय बनी हुई है। पहाड़ों के नीचे, काली मिट्टी में फैली यह खेती सिर्फ फसल नहीं, बल्कि एक सुनियोजित कृषि मॉडल है।

33 एकड़ में सब्जी खेती, 15 एकड़ में बैंगन

राधेश्याम नायक झारबंद ब्लॉक, बरगढ़ जिले के निवासी हैं और कुल 33 एकड़ में व्यावसायिक सब्जी खेती करते हैं। वर्तमान में 15 एकड़ में बैंगन की खेती चल रही है, जबकि शेष क्षेत्र में टमाटर और अन्य सब्जियों की तैयारी की जा रही है। बीते चार वर्षों से वे लगातार बैंगन, टमाटर, करेला, खीरा और लौकी जैसी सब्जियों की खेती कर रहे हैं। इससे पहले वे परंपरागत धान की खेती करते थे।

धान से सब्जी की ओर क्यों बदला रास्ता

धान की खेती में सीमित मुनाफा और मौसम पर अधिक निर्भरता ने राधेश्याम नायक को वैकल्पिक खेती के बारे में सोचने पर मजबूर किया। उड़ीसा में धान का समर्थन मूल्य 3100 रुपये प्रति क्विंटल जरूर है, लेकिन प्रति एकड़ उत्पादन सीमित होने के कारण आय संतोषजनक नहीं थी। इसके विपरीत बैंगन की खेती में निरंतर उत्पादन, स्थिर मांग और बेहतर नकदी प्रवाह ने उन्हें सब्जी खेती की ओर आकर्षित किया।

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15 जून की रोपाई और 45 दिन में उत्पादन

राधेश्याम नायक बताते हैं कि बैंगन की खेती उन्होंने 15 जून को ट्रांसप्लांटिंग के जरिए की। रोपाई के 45 से 50 दिन के भीतर फसल उत्पादन देने लगती है। उन्होंने ग्राफ्टेड वैरायटी VR-212 का चयन किया, जो उड़ीसा और पश्चिम बंगाल के बाजारों में बेहद लोकप्रिय है। इस वैरायटी में फलन ज्यादा और फसल की अवधि लंबी रहती है, जिससे बैंगन की खेती अधिक लाभदायक बनती है।

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काली मिट्टी ने घटाई बीमारियों की समस्या

इस क्षेत्र की मिट्टी मुख्य रूप से काली है, जो बैंगन की खेती के लिए उपयुक्त मानी जाती है। राधेश्याम नायक के अनुसार काली मिट्टी में बैक्टीरियल विल्ट जैसी समस्याएं लाल मिट्टी की तुलना में कम होती हैं। साथ ही फसल की उम्र भी लंबी रहती है, जिससे लंबे समय तक तुड़ाई संभव हो पाती है।

खेत की तैयारी और बेड मैनेजमेंट

खेत की तैयारी गर्मी के मौसम में की जाती है। जून महीने के मध्य तक खेत की जुताई पूरी कर ली जाती है। पहले हल से जुताई, फिर रोटावेटर से मिट्टी को भुरभुरा किया जाता है। इसके बाद बेड मेकर से मेड बनाकर मलचिंग बिछाई जाती है। पौधे से पौधे की दूरी लगभग 2.5 फीट और बेड से बेड की दूरी 8 फीट रखी गई है। यह दूरी ट्रैक्टर स्प्रे और खेत प्रबंधन के लिए जरूरी है, जो बैंगन की खेती में निर्णायक भूमिका निभाती है।

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डबल बांस सपोर्ट से बेहतर फसल प्रबंधन

बैंगन की खेती में पौधों को सहारा देना बेहद जरूरी होता है। राधेश्याम नायक 5 से 6 फीट ऊंचे बांस का उपयोग करते हैं। हर 10 फीट पर दो बांस लगाए जाते हैं और उनके बीच वायर व धागे से सपोर्ट सिस्टम बनाया जाता है। इससे पौधे फैलते नहीं हैं, फल जमीन को नहीं छूते और स्प्रे व तुड़ाई आसान हो जाती है।

ड्रिप सिंचाई से पानी की बचत

बैंगन की खेती में ड्रिप सिंचाई को अनिवार्य माना गया है। राधेश्याम नायक बताते हैं कि कम पानी में अधिक उत्पादन तभी संभव है जब ड्रिप सिस्टम हो। तीन एचपी बोर से पांच एकड़ तक की खेती आसानी से सिंचित की जा सकती है। नियमित और नियंत्रित सिंचाई से फसल की गुणवत्ता बनी रहती है।

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कीट और रोग प्रबंधन सबसे बड़ा चैलेंज

बैंगन की खेती में सबसे बड़ी समस्या फ्रूट और शूट बोरर की होती है। यह कीट तनों और फलों में घुसकर नुकसान पहुंचाता है। इसके नियंत्रण के लिए नियमित निरीक्षण, संक्रमित टहनियों की कटाई और खेत से बाहर नष्ट करना जरूरी होता है। इसके अलावा वाइट फ्लाई भी एक प्रमुख समस्या है, जिसके लिए कीटनाशकों का संतुलित उपयोग किया जाता है। बरसात के मौसम में फंगस से बचाव के लिए 10–12 दिन के अंतराल पर फंगीसाइड का छिड़काव किया जाता है।

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खाद और पोषण प्रबंधन

बैंगन की खेती में हर महीने बेसल डोज दी जाती है। ट्रांसप्लांटिंग से पहले डीएपी, सिंगल सुपर फास्फेट और पोटाश का प्रयोग किया जाता है। इसके साथ माइक्रोन्यूट्रिएंट्स और बायो इनपुट्स का भी उपयोग होता है। इससे पौधों की ग्रोथ और फलन दोनों बेहतर होते हैं।

एक एकड़ में पौधों की संख्या और लागत

2.5 फीट की दूरी पर एक एकड़ में करीब 1900 से 2000 पौधे लगाए जाते हैं। यदि ड्रिप, मलचिंग और अन्य आधारभूत ढांचा पहले से मौजूद हो, तो एक एकड़ में बैंगन की खेती शुरू करने की लागत लगभग एक लाख रुपये आती है। इसमें फील्ड प्रिपरेशन, पौधे, खाद, दवा और मजदूरी शामिल होती है।

500 क्विंटल प्रति एकड़ तक उत्पादन

सही प्रबंधन के साथ एक एकड़ से औसतन 500 क्विंटल तक बैंगन का उत्पादन संभव है। बाजार भाव यदि औसतन 15 रुपये प्रति किलो भी माना जाए, तो एक एकड़ से करीब 7 लाख रुपये की बिक्री हो सकती है। इसी वजह से राधेश्याम नायक बैंगन की खेती को धान की तुलना में कहीं अधिक लाभकारी मानते हैं।

मार्केटिंग और क्षेत्रीय मांग

उड़ीसा और पश्चिम बंगाल में बैंगन की खपत देश में सबसे ज्यादा मानी जाती है। भुवनेश्वर, कटक, पुरी और बरमपुर जैसे शहरों में इसकी स्थायी मांग रहती है। यही कारण है कि बैंगन की खेती यहां जोखिम कम और मुनाफा ज्यादा देती है।

फसल चक्र और अगली तैयारी

बैंगन की फसल जनवरी–फरवरी तक चलती है। इसके बाद खेत को धूप खिलाया जाता है और मलचिंग हटाकर दोबारा तैयारी की जाती है। राधेश्याम नायक बताते हैं कि एक ही खेत में बार-बार बैंगन लगाने से बचना चाहिए। फसल चक्र बदलना जरूरी है ताकि मिट्टी की सेहत बनी रहे।

शिक्षा और खेती का संतुलन

कंप्यूटर साइंस में बीटेक कर चुके राधेश्याम नायक मानते हैं कि खेती मजबूरी नहीं, बल्कि रुचि और सोच का काम है। उनका मानना है कि यदि किसान खेती को बिजनेस की तरह समझे और मेहनत से करे, तो बैंगन की खेती जैसी फसलें गांव में ही सम्मानजनक जीवन दे सकती हैं।

नए किसानों के लिए संदेश

राधेश्याम नायक की कहानी यह सिखाती है कि सही तकनीक, समय पर स्प्रे, संतुलित पोषण और बाजार की समझ के साथ बैंगन की खेती किसी भी किसान की आर्थिक स्थिति बदल सकती है। मौसम, मेहनत और मार्केटिंग तीनों का संतुलन ही सफलता की कुंजी है।

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