अश्वगंधा की खेती किसान भाइयों के लिए एक बेहतरीन अवसर बनकर उभरी है। यह एक ऐसी औषधीय फसल है जिसका उपयोग आयुर्वेदिक दवाइयों, हेल्थ सप्लीमेंट्स और कॉस्मेटिक प्रोडक्ट्स में बड़े पैमाने पर होता है। भारत ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भी अश्वगंधा की भारी मांग है। यही कारण है कि किसान इस फसल से अच्छी आमदनी प्राप्त कर सकते हैं। आइए जानते हैं अश्वगंधा की खेती से जुड़ी हर जरूरी जानकारी।
अश्वगंधा क्या है और कहां होती है
अश्वगंधा को ‘भारतीय जिनसेंग’ भी कहा जाता है। यह एक शक्तिशाली आयुर्वेदिक जड़ी-बूटी है जिसका उपयोग तनाव कम करने, नींद की समस्याओं, इम्यूनिटी बढ़ाने, जोड़ों के दर्द, सूजन, महिला और पुरुषों की स्वास्थ्य समस्याओं, और सौंदर्य प्रसाधनों में किया जाता है। इसकी जड़ों और पत्तियों से कई प्रकार की औषधियां बनाई जाती हैं।
उपयुक्त मिट्टी और जलवायु
अश्वगंधा की खेती के लिए बलुई दोमट मिट्टी सर्वोत्तम मानी जाती है। मिट्टी का पीएच मान 7.5 से 8 के बीच होना चाहिए। खेत में जलनिकासी की व्यवस्था अच्छी होनी चाहिए ताकि जड़ें सड़ न जाएं। अश्वगंधा की फसल को शुष्क और गर्म जलवायु पसंद होती है। यह ध्यान रखें कि ज्यादा वर्षा और पाला (फ्रॉस्ट) से इसकी पैदावार पर बुरा असर पड़ सकता है।
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खेत की तैयारी और बुवाई
गेहूं, आलू या सरसों की फसल के बाद खेत को अच्छी तरह जोतकर सोलराइजेशन के लिए खुला छोड़ दें ताकि हानिकारक कीट नष्ट हो जाएं। बुवाई का सही समय 15 सितंबर से 31 अक्टूबर के बीच माना जाता है। बीजों को बोने से पहले बाविस्टीन या कार्बेन्डाजिम से उपचारित करें। इससे फंगस और अन्य बीमारियों से सुरक्षा मिलती है।
बुवाई की विधि और दूरी
छिड़काव विधि से बुवाई करते समय 5 किलो बीज को 10 किलो रेत या पोटाश में मिलाकर छिड़कें। बीजों को बहुत गहराई में न बोएं, अधिकतम आधा से एक सेंटीमीटर गहराई पर्याप्त है। कतार से कतार की दूरी 30 से 45 सेंटीमीटर रखें।
खाद प्रबंधन
प्रति एकड़ खेत में एक बोरी डीएपी (50 किलो), एक बोरी पोटैश (50 किलो), एक बोरी सिंगल सुपर फॉस्फेट (एसएसपी), 5 किलो जिंक और 5 किलो सल्फर डालें। इन सभी खादों को मिट्टी में अच्छी तरह मिलाएं।
सिंचाई और खरपतवार नियंत्रण
पहली सिंचाई बुवाई के तुरंत बाद करें। दूसरी सिंचाई 7-8 दिन बाद करें, जिससे अंकुरण सही हो सके। तीसरी और चौथी सिंचाई 25 से 30 दिन के अंतराल पर करें और अंतिम सिंचाई 90 से 100 दिन बाद करें। खरपतवार नियंत्रण के लिए हर्बीसाइड का प्रयोग न करें, बल्कि 20-25 दिन बाद पहली बार हाथ से निराई करें।
रोग और कीट नियंत्रण
अश्वगंधा की फसल में काली मसरी रोग प्रमुख होता है। इसके नियंत्रण के लिए मैन्कोजेब या कॉपर ऑक्सी क्लोराइड का छिड़काव करें। जड़ सड़न से बचाव के लिए जलनिकासी में सुधार करें और ट्राइकोडर्मा का उपयोग करें। एफिड्स और माइट्स के नियंत्रण के लिए नीम का तेल या इमिडाक्लोप्रिड का छिड़काव करें।
कटाई, उत्पादन और प्रोसेसिंग
बुवाई से कटाई तक की अवधि 150 से 180 दिनों की होती है। फसल पकने पर पौधे को जड़ सहित उखाड़ें और तने से अलग करें। जड़ों को छाया में 5-6 दिन सुखाएं। तेज धूप से बचाएं। प्रति एकड़ 5 से 8 क्विंटल तक सूखी जड़ों का उत्पादन मिल सकता है। पत्तियों और बीजों से अतिरिक्त आमदनी प्राप्त की जा सकती है।
लागत और मुनाफा
बीज की लागत लगभग ₹1000–1500, खाद की लागत ₹5000–6000 और सिंचाई व श्रम ₹8000–₹10000 तक होती है। कुल लागत लगभग ₹25000–₹30000 होती है। सूखी जड़ों का बाजार भाव ₹300 से ₹450 प्रति किलो तक होता है। यदि उत्पादन 5 क्विंटल हो और ₹300 प्रति किलो भी भाव मिले तो ₹1.5 लाख की आमदनी हो सकती है। पत्तियों और बीजों से अतिरिक्त ₹50000 तक कमाया जा सकता है। यानी शुद्ध मुनाफा ₹1–1.5 लाख प्रति एकड़ संभव है।
बाजार और बिक्री
अश्वगंधा की बिक्री के लिए प्रमुख मंडियां दिल्ली की खारी बावली, लखनऊ का शहादतगंज, नीमच (एमपी) और चंडीगढ़ हैं। इसके अलावा आप सीधे आयुर्वेदिक कंपनियों को भी बेच सकते हैं।
FAQs
प्रश्न: अश्वगंधा की खेती किस मौसम में करनी चाहिए?
उत्तर: अश्वगंधा की बुवाई का सबसे सही समय 15 सितंबर से 31 अक्टूबर तक होता है।
प्रश्न: एक एकड़ में कितनी पैदावार होती है?
उत्तर: एक एकड़ से 5–8 क्विंटल सूखी जड़ें प्राप्त होती हैं।
प्रश्न: इसकी बिक्री कहां करें?
उत्तर: दिल्ली, लखनऊ, नीमच और चंडीगढ़ जैसे शहरों में या सीधे कंपनियों को बेच सकते हैं।
प्रश्न: क्या अश्वगंधा को बारिश से नुकसान होता है?
उत्तर: हां, अत्यधिक वर्षा और जलभराव अश्वगंधा की जड़ों को सड़ा सकता है, इसलिए जलनिकासी उत्तम होनी चाहिए।
निष्कर्ष:
कम लागत, कम देखरेख और अधिक मुनाफा देने वाली अश्वगंधा की खेती किसानों के लिए एक बेहतरीन विकल्प है। इस फसल को अपनाकर किसान अपनी आय में बढ़ोतरी कर सकते हैं। यदि आप भी कोई ऐसी खेती की तलाश में हैं जिसमें जोखिम कम और फायदा ज्यादा हो, तो इस सीजन में अश्वगंधा की खेती जरूर करें।
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