हरियाणा के सोनीपत जिले की गोहाना तहसील के महमूदपुर गांव निवासी जितेंद्र मान आज उन युवाओं के लिए मिसाल बन चुके हैं जो शहर की नौकरी और बिगड़ती सेहत के बीच फंसे हुए हैं। कभी टीसीएस जैसी मल्टीनेशनल कंपनी में CAD इंजीनियर के रूप में काम करने वाले जितेंद्र मान ने जब शरीर में लगातार दर्द, हाई बीपी और जीवनशैली से जुड़ी बीमारियां महसूस कीं, तब उन्होंने अपनी जिंदगी की दिशा बदलने का फैसला लिया। यही फैसला आगे चलकर सहजन की खेती से जुड़ा और उनकी पूरी सोच, कमाई और पहचान बदल गई।
आईटी करियर और बिगड़ती सेहत
जितेंद्र मान करीब चार साल तक साउथ इंडिया में कॉर्पोरेट जॉब करते रहे। डिजाइनिंग फील्ड में दिनभर कंप्यूटर के सामने बैठकर काम करना उनकी दिनचर्या थी। धीरे-धीरे घुटनों, कंधों, कोहनियों में दर्द शुरू हुआ, हाई ब्लड प्रेशर रहने लगा और शरीर में थकान स्थायी हो गई। शहर की एक-सी रूटीन लाइफ और शारीरिक गतिविधि की कमी ने उन्हें अंदर से तोड़ दिया। तभी उन्होंने महसूस किया कि केवल पैसा कमाना ही सब कुछ नहीं है।

साउथ इंडिया में मुरिंगा से हुआ परिचय
साउथ इंडिया में रहते हुए जितेंद्र मान ने पहली बार मुरिंगा यानी सहजन का नियमित उपयोग देखा। वहां लोग इसे सिर्फ सब्जी नहीं, बल्कि औषधि के रूप में अपनाते थे। जोड़ों का दर्द, सूजन, डायबिटीज और हाई बीपी जैसी समस्याओं में इसके सकारात्मक परिणाम उन्हें साफ नजर आए। यहीं से उनके मन में यह विचार आया कि सहजन की खेती केवल खेती नहीं, बल्कि समाज और सेहत से जुड़ा समाधान भी हो सकती है।
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नौकरी छोड़ गांव लौटने का फैसला
लगातार बिगड़ती सेहत और मुरिंगा के फायदों को करीब से देखने के बाद जितेंद्र मान ने कॉर्पोरेट जॉब छोड़ गांव लौटने का बड़ा फैसला लिया। यह फैसला आसान नहीं था, लेकिन उन्होंने जोखिम उठाया। शुरुआत में उन्होंने अपने दिल्ली स्थित घर में ही सहजन के बीज मल्टीप्लाई किए, फिर साउथ इंडिया से उन्नत वैरायटी के बीज मंगवाए और खेती की तैयारी शुरू की।

दो एकड़ से शुरू हुई सहजन की खेती
शुरुआत में जितेंद्र मान ने केवल दो एकड़ जमीन पर सहजन की खेती शुरू की। उन्होंने बीज चयन, पौधों की दूरी और प्रोसेसिंग पर विशेष ध्यान दिया। सही योजना का असर जल्द दिखने लगा। पहले ही साल उन्हें करीब 80 हजार रुपये मासिक आमदनी होने लगी और हर तीसरे महीने एक लाख रुपये तक की कमाई होने लगी। यही अनुभव उन्हें आगे बढ़ने का आत्मविश्वास देता गया।
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चार एकड़ तक पहुंचा सफर
आज जितेंद्र मान चार एकड़ में सहजन की खेती कर रहे हैं। इतना ही नहीं, वे आसपास के किसानों को भी इस खेती से जोड़ रहे हैं और उनसे पत्ते खरीदते हैं। उनका उद्देश्य केवल खुद कमाना नहीं, बल्कि एक ऐसा मॉडल बनाना है जिससे गांव के अन्य किसान भी सहजन की खेती से स्थायी आय कमा सकें।
सहजन, मुरिंगा और शेवगा – नाम अलग, पौधा एक
जितेंद्र मान बताते हैं कि सहजन, मुरिंगा, मुरिंगई, शेवगा और शिगरू एक ही पौधे के अलग-अलग नाम हैं। तमिल भाषा में इसे मुरिंगई कहा जाता है, जो आगे चलकर मुरिंगा बन गया। उत्तर भारत और दक्षिण भारत की वैरायटी में फर्क है। दक्षिण भारतीय वैरायटी में औषधीय गुण ज्यादा पाए जाते हैं, जिससे सहजन की खेती का व्यावसायिक मूल्य भी बढ़ जाता है।
बीज और दूरी का सही गणित
उनके अनुसार सहजन की खेती में सबसे जरूरी है फ्रेश बीज। पुराना बीज जर्मिनेशन कम देता है। पौधे से पौधे की दूरी एक फीट और लाइन से लाइन की दूरी चार फीट रखने से पत्तों की गुणवत्ता और उत्पादन दोनों बेहतर मिलते हैं। यह तकनीकी समझ जितेंद्र मान को अन्य किसानों से अलग बनाती है।
प्रोसेसिंग है असली गेम चेंजर
जितेंद्र मान बार-बार कहते हैं कि खेती से ज्यादा जरूरी है प्रोसेसिंग। यदि पत्तों को धूप में सुखाया जाए तो 90 प्रतिशत पोषक तत्व नष्ट हो जाते हैं। इसी वजह से उन्होंने क्लोज ड्राइंग सेटअप तैयार किया, जहां 7–8 घंटे में पत्ते क्रंची ड्राई हो जाते हैं और औषधीय गुण सुरक्षित रहते हैं। यही वजह है कि उनका उत्पाद बाजार में अलग पहचान बनाता है और सहजन की खेती लाभदायक बनती है।
कंपनियों को बेचने से बेहतर है डायरेक्ट मॉडल
यदि किसान केवल कंपनियों को कच्चा माल बेचते हैं तो उन्हें बहुत कम दाम मिलते हैं। लेकिन यदि वे खुद प्रोसेसिंग कर, लाइसेंस और जीएसटी लेकर सीधे कस्टमर तक पहुंचें, तो मुनाफा कई गुना बढ़ सकता है। जितेंद्र मान ने यही मॉडल अपनाया और सहजन की खेती को एक ब्रांड में बदला।
औषधीय परिणामों से बढ़ी मांग
सही तरीके से प्रोसेस किया गया सहजन जोड़ों के दर्द, गठिया, डायबिटीज, थायराइड और हाई बीपी जैसी समस्याओं में 10–15 दिन में असर दिखाने लगता है। इन्हीं वास्तविक अनुभवों के कारण जितेंद्र मान के उत्पाद की मांग तेजी से बढ़ी और सहजन की खेती उनकी पहचान बन गई।
सर्दियों में वैकल्पिक फसलों से अतिरिक्त आय
सहजन समर लविंग प्लांट है और सर्दियों में निष्क्रिय हो जाता है। इस दौरान अश्वगंधा और मिल्क थिसल जैसी औषधीय फसलें लेकर किसान अतिरिक्त आमदनी कर सकते हैं। यह रणनीति भी सहजन की खेती को सालभर फायदे का सौदा बनाती है।
मेहनत और क्वालिटी ही असली मंत्र
जितेंद्र मान मानते हैं कि आज किसान असफल इसलिए नहीं है कि खेती में पैसा नहीं है, बल्कि इसलिए क्योंकि वह क्वालिटी और मेहनत से समझौता कर लेता है। जो किसान एंड कस्टमर के लिए ईमानदारी से काम करेगा, वही लंबे समय तक टिकेगा।
युवाओं के लिए संदेश
जितेंद्र मान की कहानी बताती है कि खेती अब केवल परंपरा नहीं, बल्कि प्रोफेशनल बिजनेस है। सही ज्ञान, प्रोसेसिंग और मार्केटिंग के साथ सहजन की खेती युवाओं को आत्मनिर्भर और स्वस्थ दोनों बना सकती है।

पुरुषोत्तम बिसेन कृषि आधारित डिजिटल प्लेटफॉर्म sacchikheti.com के संस्थापक और कंटेंट क्रिएटर हैं। उन्होंने B.Sc. एग्रीकल्चर में स्नातक किया है और वे किसानों के लिए स्वयं कृषि से जुड़ा कंटेंट लिखते हैं।
