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आज खेती में वही किसान आगे बढ़ता है जो समय से पहले सही फैसला ले लेता है। मौसम को समझकर, बाजार की मांग को भांपकर और फसल को सही समय पर जमीन में उतारना ही असली समझदारी है। अगेती कद्दू की खेती भी ठीक ऐसी ही खेती है, जो थोड़ी सी दूरदर्शिता और नई तकनीक के साथ किसान की आमदनी का पूरा गणित बदल सकती है। कद्दू ऐसी सब्जी है जिसकी मांग सालभर बनी रहती है, लेकिन जब यह फसल बाजार में सबसे पहले पहुंचती है, तब इसके भाव किसान के चेहरे पर सच्ची मुस्कान ले आते हैं। यही कारण है कि अगेती खेती करने वाला किसान भाव के मामले में हमेशा दूसरों से आगे रहता है।
अगेती कद्दू की खेती का सही समय
उत्तर भारत में अगेती कद्दू की खेती के लिए जनवरी के आखिरी सप्ताह से फरवरी के पहले पखवाड़े तक का समय सबसे उपयुक्त माना जाता है। यदि मौसम अनुकूल हो और पाले का खतरा न हो, तो जनवरी के दूसरे सप्ताह से भी शुरुआत की जा सकती है। मध्य और पश्चिमी भारत में यह खेती दिसंबर के अंत से जनवरी में सफल रहती है, जबकि दक्षिण भारत में लगभग पूरे वर्ष संभव है। सही समय पर बोवाई करने से फसल जल्दी तैयार होती है और बाजार में पहले पहुंचती है।

खेत की तैयारी और मिट्टी की भूमिका
अगेती कद्दू की खेती में खेत की तैयारी बेहद महत्वपूर्ण है। मिट्टी भुरभुरी, हल्की दोमट और अच्छी जल निकासी वाली होनी चाहिए। खेत में पानी रुकना कद्दू के लिए नुकसानदायक है, क्योंकि अधिक नमी से जड़ें सड़ने लगती हैं। दो से तीन बार गहरी जुताई कर खेत को समतल करें और अंतिम जुताई के समय अच्छी सड़ी गोबर की खाद या वर्मी कंपोस्ट मिलाएं। अगेती खेती में पौधों को शुरुआत से ही पर्याप्त पोषण मिलना जरूरी होता है।
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बोवाई की विधि और दूरी
आज के समय में पारंपरिक तरीके की बजाय आधुनिक तकनीक अपनाना ज्यादा लाभकारी है। बेड बनाकर खेती करने से पानी निकासी बेहतर रहती है। 1 से 1.5 मीटर चौड़े और 20–25 सेंटीमीटर ऊंचे बेड अगेती कद्दू के लिए उपयुक्त रहते हैं। बीज बोने से पहले फफूंदनाशक या जैविक उपचार करना जरूरी है। अगेती खेती के लिए नर्सरी तैयार कर पौध रोपण करना ज्यादा सफल रहता है, क्योंकि इससे पौधे मजबूत होते हैं और खेत में एकसार बढ़वार होती है। पौधे से पौधे की दूरी 60–75 सेंटीमीटर और लाइन से लाइन की दूरी 2 से 2.5 मीटर रखने से बेलों को फैलने की पूरी जगह मिलती है।

सिंचाई और मलचिंग का महत्व
ड्रिप सिंचाई अगेती कद्दू की खेती के लिए वरदान साबित होती है। इससे पौधों को जरूरत के अनुसार पानी मिलता है, नमी बनी रहती है और पानी की बचत होती है। ठंड के मौसम में ड्रिप सिंचाई से मिट्टी का तापमान भी संतुलित रहता है। फूल और फल बनने के समय पानी की कमी नहीं होनी चाहिए। वहीं मलचिंग शीट लगाने से मिट्टी जल्दी गर्म होती है, खरपतवार नहीं उगते और नमी लंबे समय तक बनी रहती है। इससे उत्पादन में 20 से 30 प्रतिशत तक बढ़ोतरी देखी गई है।
पोषण, प्रबंधन और नई तकनीक
अगेती कद्दू की खेती में संतुलित पोषण बहुत जरूरी है। जैविक खाद, नीमखली, जीवामृत और सूक्ष्म पोषक तत्वों का सही समय पर उपयोग पौधों को स्वस्थ रखता है। फूल आने के समय बोरॉन और कैल्शियम का छिड़काव करने से फल सेटिंग बेहतर होती है। कई किसान बेल प्रूनिंग कर सीमित फल रखते हैं, जिससे फल का आकार बड़ा और गुणवत्ता बेहतर मिलती है।
फसल तैयार होने का समय और तुड़ाई
सही देखभाल और अनुकूल मौसम में अगेती कद्दू की पहली तुड़ाई 45 से 55 दिनों में शुरू हो जाती है। यही इसकी सबसे बड़ी ताकत है। एक बार तुड़ाई शुरू होने के बाद 2 से 3 महीने तक लगातार फल मिलते रहते हैं। हर तीन से चार दिन में तुड़ाई करने से नए फल आते रहते हैं और बेल पर अतिरिक्त बोझ नहीं पड़ता।
उत्पादन, भाव और मुनाफा
अगेती कद्दू की खेती से प्रति एकड़ 80 से 120 क्विंटल उत्पादन आसानी से लिया जा सकता है। आधुनिक तकनीक अपनाने वाले किसान 150 क्विंटल तक भी उत्पादन ले रहे हैं। अगेती कद्दू का बाजार भाव सामान्य सीजन से अधिक रहता है। जब बाजार में आवक कम होती है, तब 15 से 25 रुपये प्रति किलो तक भाव मिल सकता है। ऐसे में प्रति एकड़ अच्छी आमदनी संभव है। यही कारण है कि अगेती खेती में जोखिम के साथ-साथ मुनाफा भी ज्यादा होता है।
चुनौतियां और समाधान
अगेती खेती में ठंड और पाले का खतरा सबसे बड़ी चुनौती है। हल्की सिंचाई, धुआं करना या पॉलीटनल तकनीक अपनाकर इससे बचाव किया जा सकता है। कीट और रोगों से बचाव के लिए समय-समय पर निगरानी और संतुलित दवा प्रयोग जरूरी है। ठंड में परागण की समस्या हो सकती है, जिसे हाथ से परागण या मधुमक्खियों को आकर्षित कर हल किया जा सकता है।
अंत में कहा जा सकता है कि अगेती कद्दू की खेती सिर्फ एक फसल नहीं, बल्कि आगे बढ़ने का अवसर है। सही समय पर लिया गया फैसला किसान की आर्थिक स्थिति को मजबूत बना सकता है। मेहनत जब बाजार में अच्छे भाव में बदलती है, तब किसान को अपनी समझ और परिश्रम पर गर्व होता है।
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पुरुषोत्तम बिसेन कृषि आधारित डिजिटल प्लेटफॉर्म sacchikheti.com के संस्थापक और कंटेंट क्रिएटर हैं। उन्होंने B.Sc. एग्रीकल्चर में स्नातक किया है और वे किसानों के लिए स्वयं कृषि से जुड़ा कंटेंट लिखते हैं।
