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उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर जिले के पुवायां तहसील स्थित गंगसरा क्षेत्र में खरबूजे की खेती एक नई पहचान बना रही है। यहां के किसान दीपक कुमार ने ठेके की जमीन पर 280 एकड़ में खरबूजे की खेती कर उदाहरण पेश किया है। खास बात यह है कि उनके पास अपनी एक इंच भी जमीन नहीं है, लेकिन मेहनत और समझदारी से वह आज खरबूजे की खेती के अग्रणी किसान बन चुके हैं।

810 एकड़ से की थी शुरुआत

दीपक कुमार ने लगभग 15-20 साल पहले सिर्फ 8-10 एकड़ से खरबूजे की खेती की शुरुआत की थी। धीरे-धीरे उन्होंने अपने खेती क्षेत्र को बढ़ाया और यह आंकड़ा 100, 200 और फिर 356 एकड़ तक पहुंचा। इस वर्ष उन्होंने 280 एकड़ में खरबूजा लगाया है। हालांकि भूमि का किराया महंगा होने के कारण उन्हें इस बार कुछ क्षेत्रफल घटाना पड़ा।

पूरी जमीन ठेके की, फिर भी उत्पादन में अव्वल

उनकी खेती की विशेषता यह है कि उन्होंने सारी जमीन ठेके पर ली है, लेकिन फिर भी उनके खेतों में प्रति एकड़ लगभग 100 से 120 क्विंटल तक खरबूजे का उत्पादन हो रहा है। अच्छे मौसम और सही बीज मिलने पर यह उत्पादन 200 क्विंटल प्रति एकड़ तक पहुंच सकता है।

पूरे क्षेत्र में बन चुका है खरबूजे का हब

गंगसरा गांव और उसके आस-पास करीब 10-12 किलोमीटर के क्षेत्र में खरबूजे की खेती बड़े पैमाने पर होती है। अनुमान के अनुसार, यहां लगभग 2500 से 3000 एकड़ में खरबूजे की खेती होती है, जिसमें से 10% खेती केवल दीपक कुमार करते हैं।

280 एकड़ में खरबूजे की खेती: शाहजहांपुर के दीपक कुमार की सफलता की अनसुनी कहानी

कहां-कहां तक पहुंचता है दीपक कुमार का खरबूजा?

दीपक कुमार का खरबूजा उत्तर प्रदेश की 25-30 मंडियों में जाता है। इसके अलावा उत्तराखंड, बिहार और नेपाल तक भी इनका माल भेजा जाता है। कभी-कभार नेपाल के एजेंटों की मांग पर गाड़ियां वहां भी रवाना की जाती हैं।

लागत और मुनाफे का गणित

खरबूजे की खेती में लागत घटाने के लिए दीपक जी बीज, खाद, मल्चिंग और कीटनाशकों को थोक में खरीदते हैं। इससे उन्हें अन्य किसानों की तुलना में लगभग 15% कम लागत आती है। यदि बाजार में भाव ₹12 प्रति किलो से ऊपर रहता है तो मुनाफा शुरू होता है। पिछले साल ₹18 किलो का औसत भाव मिला जिससे एक एकड़ से लगभग ₹60,000 का शुद्ध मुनाफा हुआ।

400-500 मजदूरों को मिलता है रोजगार

इतने बड़े क्षेत्र में खेती करने के कारण दीपक जी प्रतिदिन 400-500 मजदूरों को रोजगार भी दे रहे हैं। खेत की गुड़ाई, सिंचाई और तुड़ाई के समय इन मजदूरों की आवश्यकता पड़ती है, जिससे गांव के बहुत से लोगों को काम मिल जाता है।

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खेती में सफलता के पीछे अनुशासन और जानकारी

दीपक जी बताते हैं कि सफलता के लिए हर काम का एक शेड्यूल बनाना पड़ता है। वे फरवरी से लेकर मार्च तक खेतों में बुवाई करते हैं, ताकि हर समय कुछ न कुछ उत्पादन चलता रहे। वे बीज, खाद, दवाइयों और सिंचाई की समय पर योजना बनाकर काम करते हैं।

भविष्य की योजना और चुनौतियां

दीपक कुमार का लक्ष्य इस साल 500 एकड़ में खरबूजा लगाने का था, लेकिन किराया महंगा होने के कारण यह संभव नहीं हो पाया। यदि भूमि किराया उचित होता तो वह इस लक्ष्य को जरूर पूरा करते। उन्होंने बताया कि पिछले साल मक्का की अच्छी फसल के चलते कई जमीन मालिकों ने किराया बढ़ा दिया जिससे मुश्किलें बढ़ीं।

निष्कर्ष

दीपक कुमार की कहानी यह दिखाती है कि यदि दृढ़ निश्चय और सही योजना हो तो बिना जमीन के भी कोई किसान सफल हो सकता है। उनकी मेहनत, योजना, तकनीकी ज्ञान और बाजार की समझ ने उन्हें एक सफल खरबूजा किसान बना दिया है। उनकी खेती न केवल उन्हें मुनाफा दिला रही है, बल्कि सैकड़ों मजदूरों को रोजगार भी दे रही है।

अगर आप भी बड़े स्तर पर खेती करना चाहते हैं तो दीपक जी की रणनीति और मेहनत से प्रेरणा लेकर योजना बना सकते हैं। खेती में जोखिम जरूर होते हैं, लेकिन सही जानकारी और मेहनत से ये मुनाफे में बदले जा सकते हैं।

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