नकली कृषि उत्पादों का बढ़ता खतरा, 35% किसानों ने झेला असर; असली सामान के लिए ज्यादा कीमत देने को तैयार

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भारत के कृषि बाजार में नकली कृषि उत्पाद किसानों के लिए गंभीर चिंता बनते जा रहे हैं। Crisil Intelligence और Authentication Solution Providers’ Association (ASPA) की 2025 की रिपोर्ट के अनुसार, सर्वे में शामिल 35 प्रतिशत किसानों ने पिछले 12 महीनों में कम से कम एक बार नकली कृषि उत्पाद का सामना करने की बात कही। वहीं, 82 प्रतिशत लोगों को लगा कि पिछले एक साल में ऐसे उत्पादों की मौजूदगी बढ़ी है।

नकली कृषि उत्पादों की बिक्री में रिटेल दुकानों की बड़ी भूमिका

रिपोर्ट के मुताबिक, नकली कृषि उत्पाद किसानों तक पहुंचने का सबसे आम माध्यम स्थानीय कृषि-इनपुट रिटेलर हैं। नकली उत्पाद खरीदने की बात कहने वाले किसानों में 75 प्रतिशत ने बताया कि उन्हें ये सामान आसपास की दुकानों से मिला। वहीं, 18 प्रतिशत मामलों में अनौपचारिक सप्लाई चेन का इस्तेमाल हुआ।

कृषि इनपुट बाजार में निर्माताओं, वितरकों, थोक विक्रेताओं और स्थानीय दुकानदारों की लंबी श्रृंखला होने के कारण उत्पाद की ट्रैकिंग मुश्किल हो जाती है। यही स्थिति नकली उत्पादों को वैध वितरण नेटवर्क में शामिल होने का मौका देती है।

किसान सस्ता नहीं, भरोसेमंद सामान चाहते हैं

कीमत नकली उत्पादों के बाजार में बने रहने की एक अहम वजह है। सर्वे में शामिल लोगों के अनुमान के अनुसार, नकली कृषि इनपुट असली विकल्पों की तुलना में औसतन 24 प्रतिशत सस्ते होते हैं। इसके बावजूद किसान केवल कम कीमत को प्राथमिकता नहीं दे रहे हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक, किसान ऐसे कृषि इनपुट के लिए औसतन 14 प्रतिशत तक अतिरिक्त भुगतान करने को तैयार हैं, जिनकी असलियत प्रमाणित की जा सके। इससे संकेत मिलता है कि किसान फसल और उत्पादन से जुड़े जोखिम को कम करने के लिए भरोसेमंद उत्पाद पर ज्यादा खर्च कर सकते हैं।

असली और नकली उत्पाद पहचानना अब भी मुश्किल

रिपोर्ट में जागरूकता और वास्तविक पहचान क्षमता के बीच बड़ा अंतर सामने आया है। केवल 58 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने कहा कि उन्हें नकली कृषि उत्पाद पहचानने का भरोसा है।

पैकेजिंग और लेबल किसानों के लिए सबसे प्रमुख पहचान संकेत रहे। करीब 63 प्रतिशत लोगों ने इन्हें जांचने की बात कही, जबकि केवल 26 प्रतिशत ने होलोग्राम या ट्रेसबिलिटी कोड जैसे प्रमाणीकरण संकेतकों की जांच की।

यह स्थिति चिंता बढ़ाती है, क्योंकि बेहतर पैकेजिंग के जरिए नकली उत्पाद असली ब्रांड जैसे दिखाई दे सकते हैं। केवल बाहरी रूप देखकर गुणवत्ता की पुष्टि करना हमेशा पर्याप्त नहीं होता।

2018 से 2025 तक सामने आए 276 मामले

ASPA के नकली उत्पादों से संबंधित समाचार रिकॉर्ड के अनुसार, 2018 से 2025 के बीच नकली कृषि रसायनों से जुड़े 276 मामले दर्ज किए गए। रिपोर्ट में 2018 में 50, 2019 में 51, 2020 में 47, 2021 में 38, 2022 में 33, 2023 में 21, 2024 में 19 और 2025 में 17 मामले दर्ज होने का उल्लेख है।

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इनमें करीब 40 प्रतिशत मामले उर्वरकों से जुड़े थे। हालांकि, रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि ये आंकड़े मीडिया में सामने आए मामलों पर आधारित हैं। इसलिए इन्हें नकली उत्पादों के पूरे बाजार का वास्तविक आकार नहीं माना जा सकता।

कई राज्यों में फैली समस्या

रिटेलरों से मिले आंकड़े बताते हैं कि नकली कृषि रसायनों की सप्लाई स्थानीय और अंतरराज्यीय दोनों नेटवर्क से हो रही है। करीब 40 प्रतिशत नकली उत्पाद स्थानीय स्रोतों से आए, जबकि 48 प्रतिशत दूसरे राज्यों से प्राप्त होने की जानकारी सामने आई।

उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और झारखंड को प्रभावित बाजारों में शामिल किया गया है। इसके अलावा कर्नाटक, हरियाणा, महाराष्ट्र, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश में भी नकली कीटनाशकों से जुड़ी गतिविधियों का उल्लेख रिपोर्ट में किया गया है।

खेती की लागत और उपज पर पड़ सकता है असर

नकली उर्वरक और कीटनाशक किसानों के लिए केवल आर्थिक नुकसान का कारण नहीं बन सकते, बल्कि फसल की उत्पादकता और गुणवत्ता पर भी असर डाल सकते हैं। खराब गुणवत्ता वाले इनपुट से खेती की लागत बढ़ने के साथ फसल सुरक्षा और मिट्टी की सेहत को लेकर भी जोखिम पैदा हो सकता है।

इसका असर वैध कृषि-इनपुट कंपनियों पर भी पड़ता है, क्योंकि नकली उत्पाद ब्रांड की विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचाते हैं और गुणवत्ता के लिए निवेश करने वाले निर्माताओं के सामने अनुचित प्रतिस्पर्धा खड़ी करते हैं।

मजबूत सत्यापन व्यवस्था की जरूरत

रिपोर्ट के निष्कर्ष बताते हैं कि किसानों में प्रमाणित उत्पादों की मांग मौजूद है, लेकिन खरीदारी के समय उनकी असलियत जांचने के साधन अभी पर्याप्त मजबूत नहीं हैं। सुरक्षित पैकेजिंग, ट्रेसबिलिटी, बेहतर रिटेलर सत्यापन और सप्लाई चेन की निगरानी इस समस्या को कम करने में अहम भूमिका निभा सकती है।

कृषि क्षेत्र के लिए यह मुद्दा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि गुणवत्तापूर्ण इनपुट सीधे किसानों की आय, फसल उत्पादन और खाद्य सुरक्षा से जुड़े हैं। ऐसे में उद्योग, सरकार और खुदरा नेटवर्क के बीच बेहतर समन्वय नकली उत्पादों पर रोक लगाने की दिशा में बड़ा कदम साबित हो सकता है।

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